जिगनाधाम:– यहां हर मन्नत मांगने से मुरादे होती है पूरी ,जिगिनाधाम का प्राचीन मंदिर कई सभ्यता एवं संस्कृतियों का इतिहास समेटे हुए है, मेला की तैयारी पूर्ण ,

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चित्र परिचय: जिगनाधाम का प्राचीन लक्ष्मीनारायण भगवान का मंदिर

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इटवा ,सिद्धार्थनगर। तहसील मुख्यालय से लगभग से तेरह किमी0 दूर उत्तरी छोर पर स्थित जिगिनाधाम का प्राचीन मंदिर कई सभ्यता एवं संस्कृतियों का इतिहास समेटे हुए है। धाम के इस मंदिर में लक्ष्मीनारायण भगवान का एक प्राचीन मंदिर है। जिस पर प्रत्येक वर्ष अगहन मास के षुक्ल पक्ष तिथि पंचमी को राम विवाह के अवसर विषाल मेला भी लगता है। मेले में विभिन्न क्षेत्र के श्रद्धालुओं का अपार जन समूह उमडता है। दंत कथाओं के अनुसार जगन्नाथ धाम को बषिष्ठ जी ने बसाकर भारद्वाज ऋषि को दे दिया था। जिसका बाद में नाम बदलकर आज जिगिना धाम हो गया है।इस धाम के बारे में किंवदन्तियां है कि यहां पूर्व में निवास कर रहे किसान दिनमान चैधरी को एक रात स्वप्न में अमुक मूर्ति और मंदिर दिखाई पडा था। दिव्य मूर्ति ने दिनमान से अमुक स्थान पर मंदिर निर्माण कराने का आदेष दिया था। मूर्ति के आदेष पर दिनमान चैधरी ने उक्त स्थान पर पूजन करके मंदिर का नीव खुदवाया। बताया जाता है कि नींव के दक्षिण तरफ मूर्ति स्यवं प्रकट हुई। मूर्ति की पूजा होती रही तथा मंदिर का निर्माण भी होता रहा । जब मंदिर बनकर तैयार हुई तो श्राद्धाल मूर्ति को मंदिर में स्थपित करने के लिए इक्कठा हुए । लोगो ने जब मूर्ति के तरफ देखा तो मूर्ति वहां से गायब थी। लोग आष्चर्य में पड गये। लेकिन जब मंदिर की तरफ देखा तो मूर्ति वहां स्वयं स्थापित मिली। पुरातत्वविद् बताते है कि मंदिर के नीचे एक किला भी है। तेरहवी सदी में बादषाह अलाउद्दीन के षासन काल में यहां के महन्थ बाबा विष्णू दत्त थे। बाबा विष्णू दत्त से मूर्ति बात भी करती थी। इस बात की भनक जब बादषाह अलाउद्दीन को लगी तो वह अपनी सेनाओं के साथ मंहन्थ और मूर्ति की वार्तालाप सुनने के लिये जिगिनाधाम चला आया। उसने मंहथ विष्णू दत्त से कहा कि मूर्ति से मेरी बात कराओ। मंहथ विष्णू दत्त ने मूर्ति से बातचीत करने के लिये कई बार उसको पुकारा। परन्तु कोई आवाज नही आयी। जब उन्होने आठवीं बार कहा कि मौन भयो बोलत कस नाही, तब मूर्ति से आवाज आयी कि तूने मुझे एक तुक्ष प्राणी के लिए आवाहन किया है, जा तू गूंगा हो जायेगा। बाबा विष्णूदत्त तुरन्त जमीन पर गिर पडें और उनकी जबान बाहर निकल आयी। इसे देख अलाउद्दीन भयभीत होकर 84 बीघा की बाउड्री व चैरासी गांव देने के बाद माफी नामा लिखते समय प्रत्येक वर्ष 365 स्वर्णमुद्रा मंदिर को देने का आदेष लिख दिया। जिसका रिकार्ड बस्ती मंडल के रिकार्ड रूम पत्रावली संख्या चार में आज भी मौजूद है। बदलते जमाने में मंदिर के पास मात्र एक बाग और कुछ जमीने षेष बची है। बीते लगभग 3 बर्ष पूर्ब यहां तालाब की खुदाई में एक बेषकीमती अष्टधातु मी मूर्ति भी मिली थी जो आज भी मंदिर में सुरिक्षत है लोग उस मूर्ति के दर्षन को भी जाते है।

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