संकट के साथी समाजवादी

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संकट के साथी समाजवादीकोरोना वायरस ने देश-प्रदेश ही नहीं अपितु समूचे विश्व को बहुत गहरे स्तर तक प्रभावित किया है। प्रत्येक देश इस भयानक बीमारी के चलते कुप्रभावों से गुजर रहा है। अनेक देश अपनी-अपनी योजनाओं, क्षमताओं व संसाधनों के अनुसार इस महामारी से लड़ रहे हैं। हमारा देश भी इस महामारी से लड़ रहा है, बल्कि कहें कि जूझ रहा है। अनेक प्रकार के प्रयास हो भी रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों की स्थिति क्या है, यह किसे से छुपा नहीं है। इस महामारी के भारत प्रवेश से लेकर आज तक देश और प्रदेश की सरकारों ने और उनके रहनुमाओं ने एकदम ढुलमुल व अदूरदर्शी रवैया अपनाया है। सरकार की तमाम कुरीतियों एवं कुनीतियों के चलते ही यह स्थिति इतनी खराब हुई है।
तालाबंदी के दौर के आरंभ से लेकर के आज तक इस परिस्थिति ने सरकार की भावना और उसकी कार्य शैली को भी बेपर्दा कर दिया है। सरकार की अक्षमता व मृत इच्छाशक्ति जाहिर हो गई है। सरकार के तमाम कच्चे-पक्के निर्णय और नीतियों के चलते ही जितना लोग कोरोना से परेशान हैं उससे कहीं अधिक सरकार की समाज विरोधी कुव्यवस्थाओं से। वर्तमान में मजदूरों का अपने गांव घर वापस लौटना सरकार की नाकामियों भरी नीतियों का ही नतीजा है। तमाम राहत कोष और पैकेज के बावजूद स्थिति बद्तर ही हुई है। उन्हीं का यदि सही से क्रियान्वयन सरकार करती तो गरीबों और मजदूरों को इस कदर अपनी रोजी-रोटी के स्थान को छोड़कर दरबदर भटकना नहीं पड़ता, अपने घर वापस नहीं लौटना पड़ता, मौत को गले नहीं लगाना पड़ता। जो कामगार और मजदूर अपने गृह क्षेत्र में वापस जाना चाहते उन को परिवहन सुविधाओं के माध्यम से आसानी से पहुंचाया जा सकता था और तमाम जिंदगियों को बचाया भी जा सकता था। लेकिन इसके उलट लग रहा है कि सरकार ने उनसे कोई मतलब ही नहीं रखती। उन्हें मरने के लिए ऐसे सड़क पर छोड़ ही दिया गया है। सड़क चलते-चलते दम तोड़ देने और रेल की पटरी पर कट जाने के लिए आज मजदूरों को मजबूर कर दिया गया है। कोई मदद ठीक से नहीं की जा रही है। आपने देखा होगा कांग्रेस और भाजपा सरकार का ‘बस-बस’ खेलने वाला खेल। भाजपा और कांग्रेस का यह खेल मजदूरों के साथ एक घिनौना मजाक भर है। यह जनविरोधी कुकर्म आपके सामने एक नमूने के तौर पर आया है।
वर्तमान सरकार में इस संकट के दौर में सरकारी प्रशासन और तंत्र मजदूरों को तनिक भी तवज्जो नहीं दे रहा है ऐसी संकट की घड़ी में समाजवादी पार्टी के नेतृत्व श्री अखिलेश यादव व उनके निर्देश पर उनकी पार्टी के समाजवादी कार्यकर्ताओं और नेताओं ने मदद पहुंचाने का बीड़ा उठाया है। मदद पहुंचाने का काम बड़े पैमाने पर कर रहे हैं। समूचे देश के अनेक भागों से समाजवादी कार्यकर्ताओं द्वारा तमाम जनसेवा के कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश का कोई भी ऐसा जिला नहीं है जहां समाजवादी पार्टी के तमाम समाजवादी कार्यकर्ता और नेताओं ने गरीबों की, मजदूरों की मदद ना कर रहे हों। समाजवादी पार्टी और उनके नेतृत्व के निर्देश पर किया जाने वाला यह सामाजिक कार्य सराहनीय है। इस संकट में तमाम मज़दूरों को समाजवादी लोग अनेक प्रकार से सहायता प्रदान कर रहे हैं। जहां अनेक जगहों पर लंच पैकेट(पका खाना) की व्यवस्था की जा रही है तो कई जगहों पर कच्चे-खाद्यान्न भी बांटे जा रहे हैं और तमाम खाद्य एवं रसद सामग्री भी मजदूरों तक पहुंचाई जा रही हैं। इसके साथ अनेक प्रकार की चिकित्सकीय सहायता भी की जा रही है।
इस संकट में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का बहुत ही संवेदनशील व मानवीय छवि उभर कर सामने आई है। वे जिस तरह बिना किसी दकियानूसी के स्वास्थ्य एवं सौम्य विपक्ष की भूमिका निभा रहे हैं व बिना किसी हो-हल्ला के मानवीय-संवेदना और राजनीतिक-नैतिकता के आधार पर आधार पर समाज सेवा का कार्य कर रहे हैं, वह उल्लेखनीय है। अनेक मजदूरों तथा पीड़ितों को आर्थिक मदद प्रदान की है। यह क़दम सरकार के लिए भी अनुकरणीय है। करुणा से रचे हुए ऐसे संवेदनात्मक-चरित्र के नेता आज बहुत ही कम हैं। समाजवादी लोग और अखिलेश यादव की यह कार्यशैली भारतीय राजनीति के इतिहास में अनूठी है। इतिहास में इस प्रकार की कार्यशैली रखने वाला कोई नेता नजर नहीं आता। लोहिया का ‘सगुण सिद्धांत’ जिस विचार और आचरण के ऐक्य को प्रस्तुत करता है वह मुलायम सिंह यादव में ‘कथनी और करनी में एकता’ के रूप में सामने आता है। यही आचरण बोध अखिलेश यादव में व्यवहारिक कर्म के सिद्धान्त के रूप सामने आता है। अखिलेश यादव के द्वार जरुरतमंदों की आर्थिक मदद समाजवादियों के समता-सिद्धांत का अंग है। इस संकट के दौरान उनके द्वारा की गई मदद इस बात की साक्षी है कि उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है।
अखिलेश यादव ने आज स्वयं व अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं के साथ जितना मजदूरों और तमाम पीड़ितों के लिए आगे बढ़कर काम किया हैं, वैसा आज वर्तमान में कोई पार्टी करती नजर नहीं आ रही है। इस संकट की घड़ी में पीड़ितों के लिए अनेक प्रकार की मदद पहुंचाई गई है। अखिलेश यादव के द्वारा पहुंचाई गई आर्थिक मदद के उदाहरण को साखी स्वरुप देख लेना चाहिए। जैसे- मुंबई से बनारस के कपसेठी लौट रहे चार श्रमिकों की मौत- प्रत्येक को 1 लाख रू., कानपुर में नोएडा से पश्चिम बंगाल श्रमिकों को ले जा ट्रक दुर्घटनाग्रस्त एक बच्चे की मौत – 1 लाख रु., इटावा में ट्रक की चपेट में आने से 6 किसानों की मौत- प्रत्येक को 1 लाख रू., गजरौला में दिल्ली से शाहजहांपुर जा रहे श्रमिक की पुल से गिरने पर मौत- 1 लाख रु., कानपुर के घाटमपुर में मुंबई से अंबेडकरनगर जा रहे युवक की मौत- 1 लाख रु., उन्नाव में आजमगढ़ जा रहे हैं दो श्रमिकों की सड़क हादसे में मौत- प्रत्येक को 1 लाख रू., महोबा में ट्रक हादसे के दौरान तीन श्रमिक महिलाओं की मौत- प्रत्येक को 1 लाख रू., कन्नौज में अलग-अलग हादसों के दौरान बिहार के 1-1 श्रमिक मजदूर की मौत- प्रत्येक को 1 लाख रू., उरई और कानपुर में सड़क हादसों के दौरान 1-1 श्रमिक की मौत- प्रत्येक को 1 लाख रू., गोंडा के स्कूल में चल रहे क्वॉरेंटाइन सेंटर में बच्चे की सांप के काटने से मौत- 1 लाख रु., औरैया में सड़क हादसे के दौरान 24 श्रमिकों की मौत- प्रत्येक को 1 लाख रू., आगरा में बैग पर बच्चे को खींचते हुए ले जा रही आशा को आर्थिक सहायता – 1 लाख रु., दिल्ली से दरभंगा अपने पिता को साइकिल पर ले जा रही 15 वर्षीय बच्ची को आर्थिक सहायता- 1 लाख रु.।

आज ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वर्तमान प्रदेश सरकार जो कुछ कर पा रही है उसमें पिछली सरकार का अधिकांश योगदान है। चाहे पुलिस का 112 (डायल 100) हो चाहे परिवहन की लोहिया ग्रामीण सेवाएं, चाहे असपताल हों या फ्री दवाइयों की सुविधा, बिजली पानी सड़क की सुविधा हो या गरीब-विधवा औरतों व बच्चियों तथा युवाओं के हितों की अनेक योजनाएं; इन्हीं कामों के भरोसे पर आज की सरकार है। हम इसलिए यह कह रहे हैं कि इस सरकार ने कोई भी ऐसा आधारभूत ढांचे के निर्माण में को नया काम नहीं किया है।अखिलेश यादव की इस राजनीतिक-आचरण से और इस कार्य-शैली से तमाम युवा पीढ़ी के नेताओं को सीख लेनी चाहिए। यह बात सर्वमान्य है कि समाजवादियों की पूंजी ही सेवा एवं संघर्ष है। इस कोरोना काल में राजनितिक धार अवश्य कुछ धीमी दिखाई पड़ रही है, फिर भी प्रगतिशीता बरकरार है, बात देश व समाज के लिए ठीक है। इसी रास्ते चलकर भविष्य के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है देश व प्रदेश को खुशहाली के रास्ते पर आगे ले जाया जा सकता है इसी रास्ते पर चलकर समाजवादी पुरखों के सपनों को साकार किया सकता है, एक समाजवादी वतन का सपना।

लेखक- डॉ. आलोक यादव

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