​नहाय खाय के साथ  महापर्व छठी मइया के साथ भगवान भास्कर (सूर्यदेव) की आराधना पूजा शुरू हुआ

आशीष मिश्र

बर्डपूर, सिद्धार्थनगर । लोक आस्था के महापर्व छठ का चार दिवसीय अनुष्ठान शुरू हो रहा है। इस महापर्व में छठी मइया के साथ भगवान भास्कर (सूर्यदेव) की आराधना जरूर की जाती है। कार्तिक माह की षष्ठी को डूबते हुए सूर्य और सप्तमी को उगते सूर्य को अर्घ्य को देने की परंपरा है। आपको बता दें कि बिना डाला या सूप पर अर्घ्य दिए छठ पूजा पूरी नहीं होती है। शाम को अर्घ्य को गंगा जल के साथ देने का प्रचलन है जबकि सुबह के समय गाय के दूध से अर्घ्य दिया जाता है।

               उत्सव का स्वरूप

छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इसकी शुरुआत

कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को तथा समाप्ति कार्तिक शुक्ल सप्तमी को होती है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

                     पहला दिन 
(नहाय खाय)— कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाइ कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। भोजन के रूप में कद्दू-दाल और चावल ग्रहण किया जाता है। यह दाल चने की होती है।

                        दूसरा दिन
(लोहंडा और खरना)—कार्तीक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे ‘खरना’ कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

                         तीसरा दिन

(संध्या अर्घ्य)—–कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।

                          चौथा दिन
(व्रत)—-कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। ब्रती वहीं पुनः इक्ट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रति कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं।

(व्रत)—-छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह प्रायः महिलाओं द्वारा किया जाता है किंतु कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिला को परवैतिन भी कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाए गए कमरे में व्रती फर्श पर एक कंबल या चादर के सहारे ही रात बिताई जाती है। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं। पर व्रती ऐसे कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की होती है। महिलाएं साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। ‘शुरू करने के बाद छठ पर्व को सालोंसाल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की किसी विवाहित महिला को इसके लिए तैयार न कर लिया जाए। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।’

ऐसी मान्यता है कि छठ पर्व पर व्रत करने वाली महिलाओं को पुत्र रत्न की प्राप्ति होती है। पुत्र की चाहत रखने वाली और पुत्र की कुशलता के लिए सामान्य तौर पर महिलाएं यह व्रत रखती हैं। किंतु पुरुष भी यह व्रत पूरी निष्ठा से रखते हैं।
अर्घ्य देते समय इन 4 बातों का जरूर ध्यान रखना चाहिए।

ताम्बे के पात्र में दूध से अर्घ्य नहीं देना चाहिए।

पीतल के पात्र से दूध का अर्घ्य देना चाहिए।

चांदी, स्टील, शीशा व प्लास्टिक के पात्रों से भी अर्घ्य नहीं देना चाहिए।

पीतल व ताम्बे के पात्रों से अर्घ्य प्रदान करना चाहिए।

अर्घ्य के सामानों का है महत्व—

सूप: अर्ध्य में नए बांस से बनी सूप व डाला का प्रयोग किया जाता है। सूप से वंश में वृद्धि होती है और वंश की रक्षा भी।

ईख: ईख आरोग्यता का घोतक है।

ठेकुआ: ठेकुआ समृद्धि का घोतक है।

मौसमी फल: मौसम के फल ,फल प्राप्ति के घोतक हैं।

​भक्तिमय महौल मे धूमधाम से हुई माँ लक्ष्मी प्रतिमा का  विसर्जन

वीरेन्द्र शर्मा


इटवा,खुनियांव । खुनियाव क्षेत्र में मां लक्ष्मी पूजा अर्चना कई गांवों मे माता की मूर्तियां रखकर लगातार पाच दिनों तक पूजन के बाद बुधवार को उन्हें ससम्विमानित रूप से विसर्जित किया गया। 

इन पांच दिनों में वहां पर माहौल भक्तिमय बना रहा तथा विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। खुनियांव क्षेत्र के ग्राम मैनभारिया, मझौवा, टिकुइयां, बरगदवा आदि चौराहे पर मां लक्ष्मी व गणेश भगवान की पूजा पुरोहितों द्वारा पूरे विधि विधान से सम्पन्न कराई गई। वर्ष में दीपावली के पर्व पर इन पूजा अर्चनाओं, हवनों के माध्यम से मनुष्य के जीवन दुख द्ररिद्रता दूर होती है। बल्कि वातावरण में फैले प्रदूषण को समाप्त करने के लिए हवन सामग्रियों का भी विशेष महत्व होता है। हवन के समय प्रयुक्त होने वाली सामग्रियां जैसे जौ, कपूर, तिल, पांचों मेवा तथा चन्दन की लकड़ियों को जब अग्नि में डाला जाता है तब इससे निकलने वाला धुंआ वातावरण से फैले प्रदूषण को नष्ट करने में बड़ा कारगर होता है। और इसके सम्पर्क में निवास करने में प्राणी सदा सुखी रहता हैं । हवन पूजन से न सिर्फ वातावरण ही नही बल्कि अंतरात्मा को भी संतोष प्राप्त होने की अनुभूति प्राप्त होती है। लोगों ने बताया कि इस पूजन से वर्ष भर हम लोगों को आर्थिक लाभ एवं तमाम शारीरिक एवं मानसिक संतोष की प्राप्ति होती रहती हेै।

​धूमधाम से मनाई गई  सरदार पटेल जी की जयंती 

 

डा० जंगबहादुर चौधरी


इटवा,सिद्धार्थनगर।  स्थानीय कस्बा स्थित अर्जक संघ कार्यालय पर पूर्व जिला संयोजक रवि प्रताप चौधरी की अध्यक्षता में एक बैठक की गयी। इस मौके पर उपस्थित कार्यकर्ताओं ने लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल जी के चित्र पर माल्यार्पण कर जयंती मनाया गया। इस मौके पर  रवि प्रताप ने कहा कि श्री पटेल जी ने हमेशा लोगों को एकता के सूत्र में बाधने का प्रयाश किया । साथ ही देश व समाज के लिये व्यापक स्तर पर काम किया।  हम सब को उनके बताये रास्ते पर चलने की आवश्यकता है।  इस दौरान रामवरन यादव, बबलू चौधरी,एडवोकेट राम सूरत यादव ,गिरीश मिश्रा आदि लोग उपस्थित रहे।